दुनिया को हम हमेशा अपना चश्मा ( नज़रिया ) लगाकर देखते है … और दुनिया हमे उसका चस्मा लगाकर देखती है… हम सोचते है दुनिया हमे जैसी दिख रही है दुनिया सच में वैसी ही है। और कमाल की बात ये है की दुनिया भी कुछ ऐसा ही सोच रही है.... बस समाज में सब कुछ यही से शुरू हो जाता है… कहने का अर्थ ये है की दुनिया में हर किसी को ये गलतफहमी हो गयी है की सिर्फ वो ही सही ह बाकि सब गलत.. शायद यही कारन है की हम बिना सोचे कुछ भी बोल देते है…।
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