दुनिया को हम हमेशा अपना चश्मा ( नज़रिया ) लगाकर देखते है … और दुनिया हमे उसका चस्मा लगाकर देखती है… हम सोचते है दुनिया हमे जैसी दिख रही है दुनिया सच में वैसी ही है। और कमाल की बात ये है की दुनिया भी कुछ ऐसा ही सोच रही है.... बस समाज में सब कुछ यही से शुरू हो जाता है… कहने का अर्थ ये है की दुनिया में हर किसी को ये गलतफहमी हो गयी है की सिर्फ वो ही सही ह बाकि सब गलत.. शायद यही कारन है की हम बिना सोचे कुछ भी बोल देते है…।
Friday, 10 April 2015
Tuesday, 7 April 2015
सागर.…… सागर शहर का इतिहास भी बाकी ऐतिहासिक शहरो की तरह ही है… पर सागर कुछ खास है… इसका इतिहास सन् 1660 से आरंभ होता है, जब ऊदलशाह ने तालाब के किनारे स्थित वर्तमान किले के स्थान पर एक छोटे किले का निर्माण करवा कर उस के पास परकोटा नाम का गांव बसाया था।
निहालशाह के वंशज ऊदनशाह द्वारा बसाया गया वही छोटा सा गांव आज सागर के नाम से जाना जाता है। परकोटा अब शहर के बीचों-बीचों स्थित एक मोहल्ला है। वर्तमान किला और उसके अंदर एक बस्ती का निर्माण पेशवा के एक अधिकारी गोविंदराव पंडित ने कराया था। सन् 1735 के बाद जब सागर पेशवा के आधिपत्य में आ गया, तब गोविंदराव पंडित सागर और आसपास के क्षेत्र का प्रभारी था।
विंध्य पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित यह जिला पुराने समय से ही मध्य भारत का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। सागर के आरंभिक इतिहास की कोई निश्चित जानकारी तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन पुस्तकों में दर्ज विवरणों के अनुसार प्रागैतिहासिक काल में यह क्षेत्र गुहा मानव की क्रीड़ा स्थली रहा।
पौराणिक साक्ष्यों से ऐसे संकेत मिलते हैं कि इस जिले का भूभाग रामायण और महाभारत काल में विदिशा और दशार्ण जनपदों में शामिल था। इसके बाद ईसा पूर्व छटवीं शताब्दी में यह उत्तर भारत के विस्तृत महाजनपदों में से एक चेदी साम्राज्य का हिस्सा बन गया। इसके उपरांत ज्ञात होता है कि इसे पुलिंद देश में सम्मिलित कर लिया गया पुलिंद देश में बुंदेलखंड का पश्चिमी भाग और सागर जिला शामिल था.. सागर का इतिहास इससे भी कही ज्यादा है पर सागर उसके इतिहास से ज्यादा रोचक है। कुछ अव्यवस्थित जरूर है। पर है अपर्तिम… बाकि अगले एपिसोड मे…
आज दिलो - दिमाग सिर्फ इस कश्मकश में हैं की क्या लिखूँ। जबकि लिखना मेरी चाहत है और दिमागी जरुरत भी। क्योकि मैंने सुना की हमेशा इस सच के साथ जियो की तुम कल ही मरने वाले हो/ और तुम्हारे पास सिर्फ आज का ही दिन ह कर लो जो तुम करना हो। मैं सिर्फ लिखना चाहती हूँ। सिर्फ अपने लिये… अब सपनो को पंख देना चाहती हुँ। सिर्फ अपने लिये…
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